रिपब्लिक भारत न्यूज़ 30-10-2026
सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार को एक बार फिर बड़ा झटका दिया है। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार की ‘हिमाचल प्रदेश रिक्रूटमेंट एंड कंडीशंस ऑफ सर्विस ऑफ गवर्नमेंट एम्प्लॉइज एक्ट, 2024’ से जुड़ी रिव्यू पिटीशन (पुनर्विचार याचिका) को खारिज कर दिया है। इस फैसले के साथ ही राज्य के लगभग 1.50 लाख कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों के लिए प्रथम नियुक्ति तिथि से वित्तीय लाभ और वरिष्ठता मिलने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है। कानूनी जानकारों के अनुसार, अब सरकार के पास इस मामले में आगे कोई कानूनी विकल्प नहीं बचा है।


क्या है पूरा मामला?
हिमाचल प्रदेश में साल 2003 से अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) पर भर्तियां शुरू हुई थीं। शुरुआत में योग्य कर्मचारियों को 8 साल तक नाममात्र वेतन पर रखा गया। चुनावी वर्षों में सरकारों ने इस कार्यकाल को घटाकर पहले 7, फिर 5, 3 और अंत में 2 साल किया।
नियुक्ति की मूल तिथि से वित्तीय लाभ और वरिष्ठता (Seniority) को लेकर कर्मचारी अदालत पहुंचे, जहां अधिकांश फैसले कर्मचारियों के पक्ष में आए।
इन देनदारियों से बचने के लिए सुक्खू सरकार विधानसभा में ‘हिमाचल प्रदेश रिक्रूटमेंट एंड कंडीशंस ऑफ सर्विस ऑफ गवर्नमेंट एम्प्लॉइज एक्ट, 2024’ लेकर आई। इसे साल 2003 से बैकडेट में लागू किया गया, जिसमें प्रावधान किया गया कि नॉन-रेगुलर कर्मचारियों पर रेगुलर नियुक्ति वाले नियम लागू नहीं होंगे।
देवेंद्र कुमार बनाम राज्य सरकार’ मामले में 25 अप्रैल 2026 को हिमाचल हाईकोर्ट (जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस रोमेश वर्मा की बेंच) ने 445 याचिकाओं का एक साथ निपटारा करते हुए इस एक्ट को असंवैधानिक करार देकर रद्द कर दिया और 3 महीने के भीतर भुगतान के आदेश दिए।
हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) दायर की, जिसे 29 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। इसके बाद सरकार द्वारा लाई गई रिव्यू पिटीशन भी अब शीर्ष अदालत ने खारिज कर दी है।
अदालत के इन आदेशों की अनुपालना करना राज्य सरकार के लिए एक बहुत बड़ी आर्थिक चुनौती बन गया है:
कॉन्ट्रैक्ट अवधि के सेवा लाभ देने के लिए सरकार को अनुमानित तौर पर करीब 8,000 करोड़ रुपए खर्च करने पड़ सकते हैं।
इसके अलावा, कर्मचारी-पेंशनरों के नए वेतनमान के एरियर और अन्य भत्तों के रूप में भी करीब 8,000 करोड़ रुपए का भुगतान पहले से लंबित है।
इन दोनों देनदारियों को मिलाकर सरकार पर कुल वित्तीय बोझ 16,000 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है।
अब न्यायिक रास्तों के बंद होने के बाद सरकार को अदालत के आदेशों का पालन करते हुए सभी पात्र कर्मचारियों को उनकी नियुक्ति की मूल तिथि से सेवा लाभ प्रदान करने होंगे।
